Proud To Be An Indian

Truth, Truth & Truth ... (अब तक की ज़िन्दगी को जी कर यही समझ आया है कि ज़िन्दगी सच में एक सफ़र ही है...)

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Tufail A. Siddequi


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कौन सा किसी को पता चलता है?

Posted On: 9 Dec, 2011  
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लगता है पिताजी लुढकने वाले हैं…

Posted On: 17 Oct, 2011  
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आज ‘अंग्रेजी दिवस’ है…

Posted On: 14 Sep, 2011  
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शिक्षक बनाम नेता-अभिनेता सम्मान समारोह : एक प्रहसन

Posted On: 5 Sep, 2011  
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एक कहानी- सेठ जी आप तो बेवकूफ हैं…

Posted On: 23 Jul, 2011  
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बाबू जी !!!

Posted On: 18 Jun, 2011  
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शाख से कटने का गम …

Posted On: 4 Jun, 2011  
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मानव बगिया (दुनिया) का माली है, मालिक नहीं

Posted On: 1 Jun, 2011  
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दो जानवर…

Posted On: 24 May, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

लेकिन सुन्दर दिखने और आराम प्राप्ति के लिए हम अपनी पसंद के कपडे पहन ही सकते हैं. हममे से अधिकांश लोग ये महसूस करते हैं की जब वे अपने घर की महिलाओं के साथ होते हैं तब बुरी नजर डालने वाले बहुत से दुष्ट दूर से बुरी नजर तो डालते हैं, लेकिन पास आकर उन्हें छेड़ने का दुस्साहस नहीं करते. यही कारन हैं ही हममे में बहुत से लोग अपने घर की लड़कियों और महिलाओं को अकेले नहीं भेजना चाहते. लेकिन समय और परिस्थितियां हमारे वश में नहीं होती हैं. नैतिकता एक बड़ा रोल अदा करता है. कुछ वर्ष पूर्व तक वर्तमान सी परिस्थितियां नहीं थी. छेड़छाड़ तब ऐसे भयावह रूप में नहीं था. जिस तेजी से समाज से नैतिकता का ह्रास हुआ है, वह अधिक जिम्मेदार माना जाना चाहिए. सहमत हूँ आपसे ! अच्छा सामाजिक लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

"अब तो ट्रेंड इतना बदल गया है कि पूछिये मत. हर कोई दीवाली कि मुबारकबाद दे रहा है लेकिन पीछे से अपने निहितार्थों कि पूरी पोथी भी बनाये खड़ा है. बाज़ार लोगों को सब्जबाग दिखाकर तरह-२ के प्रलोभन देता है और सामान्य से ज्यादा कमाता है. ऊपर से साल भर का घटिया सामान भी इसी बहाने निकाल लेता है. सरकार देशवाशियों को दीवाली कि बधाई देती है लेकिन राहत देने की बात नहीं करती. मंहगाई बढ़ गयी है, सिलेंडर, तेल पर घमासान मचा हुआ है. काले धन पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खामोश हैं. केजरीवाल खुलासे कर रहे है. कोई उनसे खुश है तो कोई नाखुश. ख़ुशी वाले उनके साथ हैं तो नाखुशी वाले उन्हें तरह-२ की उपाधिया दे रहे हैं. राजनीती अपने खेल खेलती ही रहती है. कोई प्रचार कर रहा है, कोई प्रसार. कोई उद्घाटन कर रहा है, कोई शिलान्यास."

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

तुफैल जी, मेरा किराएदार के मामले में कुछ अलग ही अनुभव है। जहां भी रहा, वहां मकान मालिक का व्यवहार अच्छा रहा। ऐसे में मुझे यही डर रहता था कि कहीं ये मेरे जाने के बाद अगली बार भी किसी पत्रकार को किराए का मकान हीं दे दें। यही नहीं मुझे तो अपनी बेटी के लिए मकान मालिक ने ही पसंद किया और मुझसे रिश्ते की बात चलाई। लेकिन ऐसे मकान मालिक मिलते ही कम हैं। रही छिपाने की बात। आजकल को घर परिवार में हरएक व्यक्ति दूसरे से बात छिपा रहा है। फिर मकान मालिक व किराएदार में तो ऐसी बातें ज्यादा ही मिलती है। भेदभाव की नींव अविश्वास से ही शुरू होती है। सुंदर लघुकथा के लिए आभार। 

के द्वारा: bhanuprakashsharma bhanuprakashsharma

जो आत्मप्रशंसा में लिप्त हो. - जो निर्बल होकर भी शक्तिशाली से बैर रखता हो. - जो श्रद्धाहीन को उपदेश देता हो. - जो शासन न किये जा सकने वाले पर शासन करना चाहता हो. - जो थोड़े से ही फायदे से असयमित हो जाता हो. - जो सच न सुन सके और सच बोलने वाले को ही झूठा बताये. - जो दुश्मन की सेवा करके अपने हित साधन की इच्छा रखता हो. - जो अपात्र से मांगता हो. - दूसरे के साधन को अपना बनता हो. - जो महिलाओं की निंदा करता हो. - दूसरों से सहायता लेकर समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाना चाहता हो. – जो दूसरे के उपकार को भूल जाये और अपने किये छोटे से काम की भी घूम-२ कर चर्चा करे. ——————— क्या बात है तुफैल साब , बहुत सही परिभाषा बताई आपने ! बहुत बढ़िया और सार्थक लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

तुफैल मित्र , सर्प्रथम कहना चाहूंगा की आपके इस लेख को पढ़ बेहद आनंद मिला ! और आपके द्वारा आपकी पहली पुस्तक "परिवर्तन" को अभी आधा ही पढ़ पाया हूँ ,पर यह बात मे सार्वजानिक रूप में कहना चाहूंगा की आप अब तक के पढ़े लेख समाज की आवाज है ! लगता है जैसे है लेख जिस्म की रीढ़ में उतर गया है ! शीर्षक आपके संकलन के मूल भाव को यथोचित अभिव्यक्त कर रहा है ! और एक सुझाव है यदि आप इसका भविष्य में पुन मुद्रीकरण करते है तो कुछ चित्रात्मक एखांकन को लेखों के मध्य स्थान दे सकते है ! और एक सुझाव व्यापारीकरण के सन्दर्भ में की इसका एल PDF file link के रूप में पूरी बुक या उसके महत्वपूर्ण लेखो को एक जगह स्थापित करें ! पुन आपका हादिक अभिनन्दन !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

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के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

बिजेंद्र कुमार जी सादर अभिवादन, "निंदक नियरे राखिये, जग उजियारा होए." आपने पोस्ट के भाव पक्ष को न देखकर इसमें व्याप्त भाषागत त्रुटियों की और मेरा ध्यान दिलाया, इसके लिए मै आपका आभारी हूँ. रोजी-रोटी की व्यस्तता के कारण इस मंच पर सतत लेखन का मेरा क्रम टूटा हुआ है. फिर भी प्रयास करता हूँ की एक-आध ब्लॉग पोस्ट करता रहूँ. भाव पक्ष को ही दृष्टिगत रखते हुए शायद भरोदिया साहब ने पोस्ट में व्याप्त तमाम भाषागत त्रुटियों को नज़रंदाज़ कर दिया. भाव पक्ष की ओर यदि देखा जाये तो शायद कुछ हद तक मेरी ये पोस्ट सफल होती है, ऐसा मेरा मानना है. फिर भी त्रुटियाँ तो है ही, जो की नहीं होनी चाहिए, जिनके लिए मै माफ़ी चाहता हूँ. पाठको द्वारा बहुत से उत्कृष्ट लेखों को न पढ़े जाने पर भी उन लेखों का स्तर बना रहता है. बिजेंद्र जी दूसरी बात ये की सीखने और सिखाने का क्रम तो जीवन पर्यंत चलता रहता है. जीवन में पारंगत तो कोई भी नहीं होता. एक बार मै एक बहुत ही प्रतिष्टित पुस्तक पढ़ रहा था की अचानक मेरा ध्यान उसमे व्याप्त भाषागत और व्यकरनीय त्रुटियों की ओर चला गया और में पुस्तक पढ़ना छोड़ उन त्रुटियों को मार्क करने लग गया. कुछ ही देर में मुझे भान हुआ की मै भटक गया हूँ. खैर भाव को ध्यान में रख मेरी इस पोस्ट को आप यदि एक बार और पढेंगे तो आपको ये त्रुटियाँ नगण्य लगेंगी. फिर भी आपकी प्रतिक्रिया के लिए मै आपका अहसानमंद हूँ. बहुत शुक्रिया. http://siddequi.jagranjunction.com

के द्वारा:

के द्वारा: Tamanna Tamanna

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आदरणीय सिद्दीकी जी …सादर अभिवादन ! मैं जब इस मंच पर नया -२ था तो मैं भी आपकी ही तरह बहुत ही जल्दी विवेकहीन होकर अपना आपा खो देता था ….. लेकिन इसका मतलब यह नहीं की अब मैं परिपक्व हो गया हूँ , अब भी सिर के उपर पानी गुजर जाने पर मुझसे बर्दाश्त नहीं होता है ….. ********************************************************************************************************* “वोह जो सोचते थे की मेरा नाम लेकर’ इस- भवसागर’ से पार पा जायेंगे नहीं खबर थी उनको की उलटे अपनी झोली में बदनामी पायेंगे” ….. ****************************************************************************************************** तुमको खुदा (आदरणीय ) क्या कहा तुम खुद को खुदा ही समझ बैठे **************************************************************************************************** जब हम किसी के ब्लाग पर अपने टिप्पणी रूपी विचार रखते है तो वोह उस लेखक की मल्कियत हो जाते है , कम से कम मैं तो ऐसा ही मानता हूँ ….. जो भी पाठक उस लेखक के ब्लॉग पर जाता है वोह सभी टिप्पणियो को पढ़ने का अधिकार पाता है ,लेकिन उनको अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना, सावर्जनिक करना किसी भी हालत में उचित नहीं कहा जायेगा …… ************************************************************************************************************ आपने बातो को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है , इतनी आपकी क्या विवशता आन पड़ी थी जोकि आपने कहा की मैंने आदरणीय प्रियांका जी का आपको दिया जवाब देखकर ही अपनी टिप्पणी की …. प्रियांका जी ने तो आपको और मुझको एक ही वक्त जवाब दिए थे ….. आपकी टिप्पणी मैंने इस लिए पढ़ी थी क्योंकि मैं आपको एक बुद्दिजीवी मान कर आपका आदर करता हूँ और आपके किसी भी ब्लाग पर दिए हुए विचार जरूर पढ़ता हूँ …. लेकिन उस दिन आपके विचार जानकर मुझको अपनी असहमति जताने के लिए आप पर दोष लगाने की बजाय खआप का आदर करते हुए खुद का उदाहरण देते हुए कहा था ….. ************************************************************************************************************* क्या आप मुझको बताएंगे की आप के घर में जितनी भी आदरणीय और पूज्यनीय महिलाए है क्या वोह इस तरह का कदम उठाती ? क्या वोह आपकी बात मानती है ? क्या आज तक उन्होंने आपके आदर्शो और असूलो को अपनाकर कोई बहादुरी का प्रेरणादायक काम किया है ? जरा सोच कर बताइयेगा …. धन्यवाद Rajkamal Sharma के द्वारा May 3, 2011 प्रियांका जी का आपको दिया गया जवाब देखकर मैं खुद हैरान था की जिस बात का उनको गुस्सा करना चाहिए था उसका उन्होंने कितनी विनम्रता से उत्तर दिया , वोह भी इतने विस्तार से ….. शायद वोह भी मेरी ही तरह आप का आदर करती है ,इसीलिए उन्होंने मेरी आशा के विपरीत जाकर आपको उत्तर दिया …. धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय श्री बैजनाथ पाण्डेय जी सादर अभिवादन, आपने बिलकुल सही कहा. मै इसे स्वीकार करता हूँ कि हममे से अधिकांश लोग बुराइयों पर लिख कर ही अपने कर्त्तव्य कि इतिश्री समझ लेते हैं. संभवतः इनमे कुछ डरने वाले भी होते हैं. १०० फ़ीसदी तो नहीं किन्तु डरता मै भी हूँ. ये सत्य है. और इस सत्य के पीछे कुछ कारन भी हैं. आपकी इस बात से असहमति का कोई कारन नहीं दीखता कि "डरने वाला किसी क्रांति का वाहक नहीं हो सकता." भविष्य में मै प्रयास करूँगा कि जब कभी मेरे समक्ष किसी भी प्रकार की सामाजिक बुराई होती दिखे तो उस पर कुछ लिखने से पूर्व मै उसे मिटाने में धरातल पर कुछ कर सकूँ. इस कीमती प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभार.

के द्वारा:

होली पर बहुत बहुत ही बढ़िया और विस्तृत जानकारी दी है आपने.त्युहारो की परंपरा ही इसलिए बनी है ताकि समय समय पर हम अपने परिवार समाज संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों की तरफ लौटे और स्वयं को रिफ्रेश करे , समय के साथ कुछ परिवर्तन आये है .. समय की कमी और त्योहारों के रंग में भंग डालने वाले तत्वों जो सडको पर खड़े रहते है और आने जाने वालो पर कीचड़ या गोबर फेकने या पत्थर फेकने जैसे काम करते है ...उनकी समस्या हमेशा ही रहती है.. होली में दो-तिन बार मई खुद बुरी तरह ऐसे फसा हु.. पर फिर भी होली मेरा सबसे प्रिय त्यौहार है क्योकि इसमें बहुत सारे रंग है ....... खैर अपनी बात फिर कभी.. आपका लेख पढ़ा बहुत अच्छा लगा.. होली की शुभकामनाये

के द्वारा:

बाजारीकरण के कारन रसायनयुक्त रंगों के प्रयोग के साथ ही डी.जे. की पाश्चात्य धुन और शराब के प्रयोग का चलन बढ़ता ही जा रहा हैं. महिलायों की मान-मर्यादा भी यदा-कदा भंग होती है. यही कारन हैं की अब त्योहारों का रंग फीका पड़ने लगा है. प्रिय सिद्दीकी जी ..बहुत सुन्दर प्रयास आप का समाज के प्रति -काश आप लोगों सा सब बने. विविधता में एकता -हमारे भारत की पहचान -ये हमारे संस्कृत की धरोहर सदा बनी रहे --सार्थक प्रयास रंग और गुल खिला दिया आपने इस चमन में -लोगों को हमेशा सीमा में रह कुछ करना चाहिए मान मर्यादा का ध्यान रख सच कहा आपने -पहले सा मन का मिलना गले लगाना महीनो भर होली का जश्न अब कहाँ ??? शुक्लाभ्रमर५

के द्वारा: shuklabhramar5 shuklabhramar5

आदरणीय डा.. एस शंकर सिंह जी सादर अभिवादन, निश्चित ही आप प्रधानमंत्री के बारे में मुझसे अधिक जानते हैं. लेकिन मै एक बात कहना चाहूँगा की हमारे प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत योग्यता पर किसी को भी संदेह नहीं होगा, निश्चित ही आपको भी नहीं. उसके बावजूद यदि देश की दुर्दशा हो रही है तो वे जिम्मेदार हैं. इसका कारन है कि वे कुछ लोगों कि सलाह पर चल रहे हैं. प्रधानमंत्री पद के तमाम अधिकारों के बाद भी वे कुछ नहीं कर रहे हैं. और यही कारन है कि वे अनर्थशास्त्री कहलाने लगे हैं. हमें ऐसे प्रधानमंत्री कि दरकार है जो देश हित में बिंदास होकर फैसले करे. देश और देश वासियों के लिए न कि चंद लोगों के लिए. साथ ही आपसे विनम्र निवेदन से साथ कहना चाहता हूँ कि मनुष्य आजीवन सीखता रहता है. मैंने तो सीखने की ओर अभी कदम बढाया ही है. गलती पर आप स्पस्ट सुधार हेतु कहें. 'क्षमा प्रार्थना' जैसे शब्दों का प्रयोग न करके आप मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करें. प्रतिक्रिया के लिए आपका तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ.

के द्वारा:

तुफैल भाई... ये बात पूरी तरह सत्य है की प्रेम कभी किसी दिन का मोहताज नहीं है .. ये डे का चलन पश्चिमी सभ्यता की बाजारवादी आक्रमण का हिस्सा है जो 5 रुपये के कार्ड के हमसे 100 रुपये झटक लेता है ... 10 रुपये के चाकलेट के बदले 75 रुपये लेता है ..ये एक तरह की नई लूट है ..और हम मजबूर है .. क्योकि आधुनिक बनना चाहते है तो कीमत तो देनी ही पड़ेगी .. तो दिए जा रहे है .. क्या फादर्स डे से पहले हम पिता को प्रेम या सम्मान नहीं करते थे... पर आजकल तो सबको डे में बांध दिया गया है . साल भर में सबको प्रेम प्रदर्शित करने का एक एक दिन तय ... पहले हर दिन हम सबको प्रेम करते थे बिना किसी ...विशेष प्रयोजन के... अब भावनाए ख़त्म होती जा रही है और उनका प्रदर्शन ख़त्म होता जा रहा है..... अच्छा लेख है बधाई

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

सिद्दकी जी प्रणाम सिद्दकी जी इसको कहते है दबंगई पहले जानवरों के रहने की जगह पर कब्ज़ा करों उसके बाद उनको उस जगह से ही भी बाहर कर दो या गोली मार दो फिर तो इस धरती पर सिर्फ इंसान रह जायेंगे अभी हाल ही में राजेंद्र जी ने भी उतरांचल की घटना का जिक्र किया था जिसमें हाथी को निशाना बनाया जा रहा था इन्सान अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए इनको प्रकर्ति से बाहर कर रहा है जो प्रकर्ति में रहने का बराबर के हकदार है जितने हम! सिद्दकी जी बेहतर यह है की हम अपनी बढती जनसँख्या को नियंत्रण में रखे और जंगलों का अतिक्रमण न करें अगर आप जगलों का अतिक्रमण करेगें तो ये जगली जानवर कहाँ जायेगे जाहिर सी बात है शहर की तरफ भागेगें उस पर आप जिम्मेदार भी इन्हें ही ठहरादो सरकार जनसँख्या मुद्दे को हलके में ले रही है जबकि चाइना ने इस पर प्रभावी ढंग से काबू किया है समय आ गया है की इस पर कोई ठोस पहल हो जानी चाहिए आशुतोष दा

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 सिद्दीकी जी आपने ये ग़ज़ल तो सुनी ही होगी की मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है , और यही कारण है की मै आजभी अबोध ही हूँ, डर लगता है की समझदार हो जाऊंगा तो .... मैंने इसी तरह के प्रशन का उत्तर की मैंने अपना नाम अबोध क्यों रखा कहा था की नाम हमें जाती धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र आदि में बाँट देते हैं, मै अगर कुछ ऐसा लिखूं जो की दुसरे धर्म, समाज, जाती के विरुद्ध हो तो केवल मेरे नाम के अधर पर ही कहा जायेगा की इसने ये इसलिए कहा ....... दूसरी बात जो आपने लिखी की मंच के करता धर्ताओं के नज़र मेरे लेखन पर लगातार बनी है, साब मैंने कोई रिश्वत उनको नहीं दी है, विश्वास करें, मै लेखक हूँ ही नहीं, बस थोडा प्रयास करता हूँ, पर आप जैसे अनुभवी लेखकों को तो मेरे लेख देख कर ही पता चल जाता हूँगा की मेरा standard क्या है वैसे आपके इतना कहे देने से की मै बेहतरीन लिखता हूँ दिल बाग़ बाग़ हो गया था पर आपके बाकी के लेख से लगा की...... http://abodhbaalak.jagranjunction.com

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