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एक प्रभुत्व संपन्न और आजाद गणतंत्र या फिर ...

Posted On: 24 Jan, 2013 Others में

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एक प्रभुत्व संपन्न और आजाद गणतंत्र या फिर …
काफी मशक्कत के बाद आज़ादी मिली. फिर 26 जनवरी, 1950 के दिन भारत के संविधान को लागू किया गया। आने वाली २६ तारिख को भारत अपने गणतांत्रिक होने की 63वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से एक पवित्र किताब माने जाने वाले संविधान में यूं तो समानता के अधिकार को मुखर रूप में अंकित किया गया है लेकिन इसका उपयोग कभी कोई नहीं कर पाया। आखिर क्या कारन हैं इसके पीछे ? विश्व स्तर पर हम आज भी विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं. हां, कुछ से बेहतर स्थति में हैं, ये बात दीगर है. देश की सुरक्षा के मामले में हम पर तलवार सदैव लटकी ही रहती है. चीन तो आये दिन हमें आँखें दिखाता ही रहता है. उधर पाकिस्तान ने तो बंटवारे के समय से ही भारत को मानों अपनी आँखों में बसा लिया हो. भारत से दुश्मनी निकलने के लिए उसने जिन्हें शय दिया आज वही उसके खून के प्यासे ज्यादा हैं. वह अपनी स्थिति के लिए एक प्रकार से खुद ही जिम्मेदार है लेकिन अफ़सोस कि हम खामखाह भुक्तभोगी बन रहे हैं. लेकिन ज्यादा अफ़सोस इस बात का है कि कोई लगातार हमारी नाक में ऊँगली कर रहा है और हम शांति तथा उदारता कि बात करके चुप हो जाते हैं. पिछले दिनों हमारे सैनिको के साथ हुयी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही किसी भी सूरत में बर्दास्त करने लायक नहीं है लेकिन फिर भी ….. नीति नियंताओं के आगे सारा देश बेबश है. आंतरिक स्थिति के मोर्चे पर भी सुकून नहीं हैं. समस्याएं, परेशानियाँ तो हर जगह हैं लेकिन वहां कम से कम उनसे लड़ने और उन्हें दूर करने कि दृढ इच्छाशक्ति तो है. हमारे देश में हो-हल्ला ज्यादा दीखता है और हल कम. नीति-नियंता, व्यवस्थापक अपने मोर्चे ही ज्यादा संभाले दिखाई देते हैं. मुद्दे कि बात ये है कि एक और तो नागरिकों कि जिम्मेदारी लेते हैं लेकिन दूसरी और उनका शोषण भी करते हैं. ५ सालों के राज को ये कभी न ख़त्म होने वाला समझ बैठते है. अशिक्षा, नैतिकता का ह्रास, बेरोजगारी, आंतरिक असुरक्षा, असमानता, गरीबी-अमीरी कि बढती खाई, बलात्कार जैसे घ्रणित कृत्य पर कोई लगाम लगती नहीं दिखती हैं. बलात्कार के लिए आज भी अधिकतम उम्रकैद कि सजा तक कि बात कि जा रही है, लेकिन पीडिता जिन्दा लाश ही अधिक बन जाती है. बलात्कारी को मौत कि सजा या फिर अधिकतम दर्द देने वाली सजा पर बात करने से हम आज भी कतरा रहे हैं. २ दिन बाद दिल्ली कि बलात्कार कि घटना को एक महिना १० दिन हो जायेंगे, लेकिन अभी केवल सुनवाई चल रही है. अदालत कि कार्यवाही के साथ ही करीब ६ सौ पन्नों कि रिपोर्ट और ८० हजार सुझावों पर अभी विचार किया जाना बाकि है. परिणाम भविष्य के गर्भ में हैं. देश कि राजनीती में हलचल मची रहती है. पार्टियों के तो क्या कहने. धर्म और जाती के नाम पर रोटियां बदस्तूर सेकी जा रही हैं. उधर सरकार ने एक नया फार्मूला इजाद कर लिया है- जनता के साथ छुपन-छुपाई खेलने का. पहले दाम बढ़ा देना फिर घटा कर सहानुभूति ले लेना. पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस पर यही हो रहा है. जिन लोगों ने मूर्ख बन फैसले को निश्चित मान लिया था वे ठगे गए और ६ सिलेंडरों के बाद ७वे पर दोहरे रगड़े गए. बाद में स्कीम में थोडा चेंज. सत्ता में जहर है तो भला उससे चिपकने को किसने कहा ? दूर रहना चाहिए न. लेकिन ……. बहुत ज्यादा कानून बनाने से बेहतर है की जो हैं उन्ही का सही ढंग से पालन करवाया जाये. प्रकृति भी संतुलन से ही चलती है. फिर हम संतुलन बनाने से परहेज क्यों करते हैं? देश के भीतर मौजूद कानूनों के साथ ही संतुलित और समभाव होकर उनका पालन किया जाये तो उम्मीद की जा सकती है की ये गणतंत्र कुछ समय में अपना हुलिया बदल लेगा अन्यथा हम एक प्रभुत्व संपन्न और आजाद गणतंत्र हैं या फिर ….. ये प्रश्न यूं ही चलता रहेगा. कुछ सवाल तो ऐसे होते हैं जिनके जवाब होते ही नहीं लेकिन कुछ के होते हैं और हम उन्हें खोजना ही नहीं चाहते. एक नए साल की शुरुआत है और गणतंत्र दिवस की बेला भी लेकिन गणतंत्र दिवस की मुबारकबाद देते हुए पता नहीं क्यों उस खुशी का अनुभव नहीं हो रहा है, जिसकी की मन में एक चाह छिपी हुयी है…….

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manoranjanthakur के द्वारा
February 21, 2013

bahut sunder ….sahi soch ko jagata … badhai …. वन्दे मातरम!

    TUFAIL A. SIDDEQUI के द्वारा
    February 26, 2013

    आदरणीय ठाकुर साहब सादर अभिवादन, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

shashibhushan1959 के द्वारा
January 27, 2013

आदरणीय तुफैल जी, सादर ! “”एक नए साल की शुरुआत है और गणतंत्र दिवस की बेला भी लेकिन गणतंत्र दिवस की मुबारकबाद देते हुए पता नहीं क्यों उस खुशी का अनुभव नहीं हो रहा है, जिसकी की मन में एक चाह छिपी हुयी है…….”"” ऐसा ही अनुभव हम को भी हो रहा है ! समस्याएं बहुत हैं, समाधान का पता नहीं ! एक विचारणीय रचना ! सादर !

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    February 4, 2013

    आदरणीय भूषण जी सादर अभिवादन, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

jlsingh के द्वारा
January 26, 2013

सिद्दीकी साहब, नमस्कार! सभी ज्वलंत समस्यायों पर विवेचना सटीक है … अब जनता के हाथ में कमान आने वाली है ..कम से कम इस बार अपने मत का प्रयोग सोच समझ कर करें! आगे तो भगवान् ही मालिक है!

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    February 4, 2013

    आदरणीय सिंह साहब सादर अभिवादन, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. बिलकुल, अपने मत का प्रयोग सोच समझ कर ही करना चाहिए. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

akraktale के द्वारा
January 25, 2013

आदरणीय तुफैल ए. सिद्दीकी जी सादर, सुन्दर आलेख. सच है सरकारें आती हैं अपने हित के काम करती हैं नेता जेबें भरते हैं और चले जाते हैं ना देश कि कोई चिंता ना ही जनता कि कोई चिंता ऐसे में गणतंत्र दिवस मनाये भी तो कैसे? मगर विवशता है. अब जनता का लगातार आक्रोश देखकर भी यदि नेता नहीं सुधरे तो परिणाम भयानक होंगे. सुन्दर आलेख पर बधाई. गणतंत्र दिवस कि आपको भी शुभकामनाएं. हाँ मगर गणतंत्र कि ६३वीं वर्षगाँठ की आपने के वर्ष आगे बढ़ा दिया है कृपया उसे ठीक कर लें.सादर.

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    February 4, 2013

    आदरणीय अशोक जी सादर अभिवादन, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. भूल सुधार कर लिया है. आपका शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

seemakanwal के द्वारा
January 24, 2013

सार्थक लेख .बधाई गणतन्त्र दिवस मुबारक हो .

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    February 4, 2013

    आदरणीय सीमा जी सादर अभिवादन, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

nishamittal के द्वारा
January 24, 2013

समस्याओं को बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है आपने सिद्दीकी जी.

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    February 4, 2013

    आदरणीय निशा जी सादर अभिवादन, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com


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