Proud To Be An Indian

Truth, Truth & Truth ...

146 Posts

1379 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 580 postid : 2225

बचपन में तो तुम होशियार थे, अब पता नहीं... (लघु कथा)

Posted On: 28 Nov, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

जब वो छोटा था, तब उन सभी लोगों को उससे बहुत लगाव था. उम्र में कम और एक किशोर होने के बावजूद उसकी समझदारी की सभी बहुत तारीफ किया करते थे. सीधा-साधा, समझदार और सभी का कहना मानने वाला था वो. पिताजी स्वर्ग सिधार गए तो अपनी माता की ऊँगली पकड़कर वह सभी जरुरी काम निबटा लिया करता था. उसकी अगुवाई के कारन ही सभी उसकी मदद भी कर देते थे. रास्ता दिखाकर आगे भी चलने वाले काम ही होते हैं. लेकिन उस समय उसका सौभाग्य था की उसे चंद लोग ऐसे भी मिल गए थे, जो उसकी मदद की खातिर उसे रास्ता भी दिखाते और जरुरत पर आगे भी चलते थे. ऐसे ही कुछ लोगों से उसके पारिवारिक सम्बन्ध भी हो गए थे. समय बीतता गया और उस समय के साथ बहुत कुछ नया पुराना हो गया था, बहुत सी बातें नयी हो गयी थी. परिस्थितिया भी बदल चुकी थीं. समय के साथ ही लोगों का साथ भी बदल चुका था. कुछ कहीं तो कुछ कहीं जा चुके थे. शेष थी तो उनकी यादें और कभी-२ कुछ पलों की मुलाकातें. एक लम्बे अरसे के बाद छोटी सी मुलाकात बहुत अच्छी लगती है. संक्षेप में बहुत सी बातें हो जाती हैं. ऐसे ही एक दिन उसी पुराने समय के उसके एक अंकल का आना हुआ. फ़ोन से खबर पहुंची और पता चला कि अंकल तो बहुत जल्दी में हैं, लेकिन तुमसे मिलना चाहते हैं, तो तुरंत दर्शन करने पहुँच गया. अभिवादन कर बहुत ख़ुशी हुयी. चाय-पानी हो चुका था. बस विदाई की तैयारी थी. अंकल ने कुछ अपने और कुछ उसके गम साझा किये. और चलने के लिए तैयार हो गए. चलते-२ बेटा… देखो तुम बड़े हो… तुम्हारी माता जी ने बहुत मुशीबतें उठा कर तुम लोगों को पाला है. अब तुम्हारी जिम्मेदारी बनती है कि तुम इन सबकी देखभाल करों. “बचपन में तो तुम होशियार थे, अब पता नहीं…” कहकर अंकल तो अपने रास्ते हो गए. लेकिन उसके मन में एक सवाल छोड़ गए… “बचपन में तो तुम होशियार थे, अब पता नहीं…” आज भी वह सोचता रहता है कि जब बचपन में वह होशियार था तो अब ………?????????

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manisharaghav के द्वारा
November 29, 2012

सिद्दकी भाई , आदाब अर्ज सिद्दकी भाई आपकी लघु कथा ‘ बचपन में तो तुम — पढ़ी । बहुत अच्छी लगी । भाई हम हिन्दुस्तानियों की सोच कभी नहीं बदल पाएंगे , हम हिन्दुस्तानी लडके को अपनी जागीर समझते हैं , हम तमाम उम्र दुल्हन लाने के ख्वाब देखते है जब दुल्हन घर आती है तो हम सोचते हैं कि श्रवण कुमार जैसा बेटा भी शादी होकर बदल जाता है ।

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय बहन मनीषा जी सादर अभिवादन, पोस्ट आपको पसंद आई. प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

nishamittal के द्वारा
November 28, 2012

सुन्दर लघु कथा पर बधाई

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय निशा जी सादर अभिवादन, पोस्ट आपको पसंद आई. प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

akraktale के द्वारा
November 28, 2012

आदरणीय सिद्धकी जी                             सादर, सच ही कहा अंकल ने क्योंकि उन्होंने उसे बचपन में ही तो देखा था और उम्र के बदलाव के साथ जवाबदारी भी बदलती है और हालत भी. सुन्दर लघुकथा के लिए बधाई स्वीकारें. 

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    November 29, 2012

    आदरणीय अशोक जी सादर अभिवादन, सही है सर जी कि उम्र के साथ जवाबदारी और हालत दोनों बदल जाते हैं. पोस्ट आपको पसंद आई. प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com


topic of the week



latest from jagran