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बेटा अब तो तू मेहमान हो गया है... (लघु कथा)

Posted On: 15 Nov, 2012 Others में

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मानुष अपने परिवार के साथ अलग रहने लगा. एक बार माँ-बाप, भाई-बहन का साथ छूटा तो फिर बस राम-सलाम तक ही सीमित हो गया. औरत के अनेक रूप होते हैं लेकिन माँ तो माँ ही होती हैं. इसका ये मतलब नहीं कि माँ के सिवाय औरत के दूसरे रूप कम महत्त्व के हो जाते हैं. लेकिन क्या औरत का सर्वोत्तम रूप माँ ही नहीं है. मानुष ने सोचा भी नहीं था कि परिस्थितियां ऐसी हो जाएँगी कि नयी शाखाएं आ जाने पर पुरानों को छोड़ना पड़ेगा. वह किसी को दोष नहीं देना चाहता है. वह यह भी सोचता है कि क्या मालूम समय और परिस्थिति के अनुसार वर्तमान ही उसके लिए बेहतर हो. लेकिन माँ से बिछड़ने की पीड़ा क्या शब्दों में बयां हो सकती है. खैर पहले तो मानुष ४-६ दिन में घर हो आता था. उसका चेहरा देख माँ का मन भी थोडा सा तो हल्का हो ही जाता था. लेकिन कभी-कभी मानुष के न चाहते हुए भी १०-१५ दिन गुजर जाते थे. माँ से मुलाकात को वह भी तरसता और माँ भी उससे मिलने को. उधर माँ चाहते हुए भी न तो खुद जा पाती थी, और न फोन ही कर पाती थी. बस अन्दर-ही-अन्दर तड़पती जरुर रहती. और फिर एक बार मानुष जब १०-१५ दिनों में घर गया तो माँ से रहा न गया और खाना देते हुए माँ ने कहा- खा ले बेटा, खा ले… अब तो तू मेहमान हो गया है….. मानुष अवाक रह गया, वह सन्न रह गया. उसका अंतर्मन भीतर तक कौंध चुका था. मानुष के पास कोई उत्तर न था माँ की बात का. सर नीचे करके खाना तो मानुष ने खा लिया लेकिन माँ के शब्द उसके कानों में गूंजते रहे. आज भी मानुष के कानों में माँ की वह बात उस दिन की ही भांति गूंजती रहती है… बेटा अब तो तू मेहमान हो गया है…

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manisharaghav के द्वारा
November 29, 2012

, आदाब अर्ज , सिद्दकी भाई जब मैंने लेख , कहानी ,कविता लिखना शुरू भी नहीं किया था तब से मुझे लघु कथा या कहानी बहुत भाती है । आपका अब तो तुम —— लेख पढ़ा । भाई जो आदमी दो नावों पर पैर रखकर सफर करता है उसकी पीड़ा सिर्फ वही आदमी समझ सकता है जो इस दौर से गुजर चुका हो चाहे आप इसे एक माँ की ममता ही क्यों न कहें यह ठीक नहीं है एक माँ को भी अपने बेटे की जिम्मेदारियों को समझना ही चाहिए । दो नावों से मेरा मतलब दो घरों की जम्मेदारियाँ उठाने से है । आपकी लघु कथा सराहनीय है । और यह बात लिखकर मैं उन रीडर्स को समझाना चाह रही हूँ जो सिर्फ एक तरफ यानि की माँ का पक्ष देख रहे हैं ।

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    December 11, 2012

    आदरणीय मनीषा बहन जी सादर अभिवादन, पोस्ट आपको पसंद आई. प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

chaand के द्वारा
November 21, 2012

तुफैल जी ,वात्सल्य भावमयी आलेख, बधाई.

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    November 21, 2012

    आदरणीय चाँद जी सादर अभिवादन, पोस्ट आपको पसंद आई, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
November 15, 2012

सिद्धिकी जी बहुत ही वात्सल्य भावमयी आलेख के लिये बधाई ,,,,

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    November 16, 2012

    आदरणीय अनुराग जी सादर अभिवादन, पोस्ट आपको पसंद आई, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

pitamberthakwani के द्वारा
November 15, 2012

बहुत ही दर्द भरी बात कहकर दुखती राग पर हाथ रखने वाली बात के लिए आभार है!,सिद्दीकी जी,क्या मुस्लिम समाज में भी यही विघटन हो रहा है? हम माँ के लिए जब तड़पते है तो समय निकल गया होता है!

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    November 16, 2012

    आदरणीय पीताम्बर जी सादर अभिवादन, मुझे ऐसा लगता है की समय और परिस्थितियां धर्म, जाति, स्थान, भाषा देखकर नहीं आतीं हैं. समाज को संबंधों का जाल कहा गया है. जाहिर है, जब संबंधों में गांठें और दर्द महसूश होने लगे तो, एक प्रकार का विघटन ही है यह. आप शायद ठीक कह रहे हैं- हम माँ के लिए जब तड़पते है तो समय निकल गया होता है! इसीलिए कहा गया है की रिश्ते बढ़ाने से अच्छा है, जो थोड़े से हैं, उन्हें ही संभाल कर रखा जाये. पोस्ट आपको पसंद आई, प्रतिक्रिया के लिए बहुत-२ शुक्रिया. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com


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